न्य कीजिए । हाँ क्रोधवअमृतघट 2- चौ. मदन मोहन समर

 


 


 


 


 


अमृतघट 2


चौधरी मदन मोहन समर



अमृतघट में हम चर्चा कर रहे हैं हमरे भीतर उठने वाले उन छः वेगों की जो हमारे लिये अत्यधिक हानिकारक हैं। कल हमने पहले वेग वाणीवेग पर बात की थी, आशा है आपने अभ्यास किया होगा और इस अभ्यास से आपको कुछ सकारात्मक प्राप्त हुआ होगा।


*दूसरा वेग- क्रोधवेग*
यार छोड़ो न, क्यों मूड खराब करना। उफ! यार वह तो मानता ही नहीं, ठीक कर दूंगा उसे, समझता क्या है वह अपने आप को। क्या बात है ? आप मेरी तरफ ध्यान ही नहीं दे रहे, यह ठीक नहीं है। मैने उसके लिए कितना किया और वह अहसान फरामोश मुझे ही भूल गया, वक्त आने दो सब चुकता करा लूंगा।  अरे! यह क्या पोस्ट डाल दी उसने फेसबुक पर बेहद मूर्ख हैं ये लोग इस तरह की पोस्ट डालते हैं, और आपकी त्यौरियां चढ़ गईं। लेकिन इससे आपको क्या लाभ हुआ और किसी को क्या फर्क पड़ा। यही तो है क्रोध। 


यह बात हर व्यक्ति जानता है क्रोध का वेग अग्नि से भी प्रचंड होता है। हम रोज अनेक बार इस विचार से परिचित होते हैं कि क्रोध से बचना चाहिये। क्रोध व्यक्ति के पतन का कारण है। हर शास्त्र, लोक व्यवहार, और संस्सकार यही कहते हैं क्रोध मत करो, लेकिन फिर भी हम क्रोधित हो ही जाते हैं । दिन में एकाधिक ऐसे अवसर होते हैं जब व्यक्ति को पता ही नहीं चलता कि वह क्रोधित हो गया। यही क्रोधवेग है। “ इसका वेग थमता है तो अकेले में हम यही तो कहते हैं यार छोड़ो क्यों मूड खराब करना” अर्थात हम जानते हैं कि हमारा क्रोध निरर्थक था। तो फिर क्यों नहीं समझ सकते इसे। इसका वेग किसी जंगल में ग्रीष्म ऋतु में सूखे पत्ते में लगी आग की तरह होता है। बस एक बार शुरू तो सब कुछ समाप्त।


इस वेग के उद्गम  को समझना जरूरी है। हमारे मस्तिषक में अनेक हार्मोन क्रिया-प्रतिक्रिया करते हैं। ये हार्मोन हमारी भावनाओं, विचारों और इच्छाओं के अत्यंत संवेदनशील तंतुओं को कैच कर अपना प्रभाव प्रदर्शित करते हैं।अच्छे और खराब हार्मोन का विकास करना हमारे नियंत्रण में ही होता है।अच्छे और शुभ हार्मोन का विकास साधना से होता है जबकि खराब हार्मोन खर-पतवार की भांति अनियंत्रित होते हैं। उनमें से एक खराब हार्मोन क्रोध के प्रचंड वेग का जनक है। इसका प्रारम्भ होता है इच्छा के अधूरे रहने पर। क्यों मूड खराब हुआ? इसीलिये न, कि आपकी मनचाही बात पूरी नहीं हो सकी। ईगो हर्ट हुआ आपका। आपकी इच्छा थी कि आपकी बात सुनी जाए, लेकिन नहीं सुनी गई। आपकी इच्छा थी कि आपकी प्रशंसा हो लेकिन नहीं हुई। आपकी इच्छा थी कि आपको अमुक वस्तु प्राप्त हो, लेकिन नहीं हुई। आप एक पद पर हैं आप चाहते हैं कि लोग आपके पद का सम्मान करें। किसी ने जरा अनदेखा किया नहीं कि आप बरस पड़े। किसी ने आपके आदेश को पूरा करने में असमर्थता व्यक्त की नहीं कि आप हो गये लाल-पीले। आपकी आदत में खलल डाला नहीं कि लग गई मिर्ची। अब आप ही तो सबसे ज्यादा कुशल, बुद्धीमान और इज्जतदार हैं तो आपका अधिकार बनता है क्रोधित होने का। और यही सब विपरीत हुआ नहीं कि बस हो गया मूड खराब। आ गया गुस्सा। और जब यह आया तो इसका वेग किसी अंधड की तरह आपको फंसा कर ऐसे कर देगा जैसे आपने किसी देखा होगा कि कोई अंधड कैसे सूखे पत्ते, खाली पन्नियां और कागज उड़ा कर ले जाता है और फिर पता ही नहीं चलता वे कहाँ गिरे। क्योंकि इसमें उड़ने वालों में वजन ही नहीं होता। जब वजन ही नहीं होगा तो वे सामना कैसे करेंगे अंधड़ के वेग का। यही अंधड क्रोधवेग का प्रतीक है। आप वजनदार नहीं हैं तो इस वेग से कैसे बच पाएंगे? अब जब इच्छा पूरी नहीं हुई और आप उड़ गए क्रोध के वेग में तो आप अकेले नहीं उड़ेंगे। आपके साथ वे सारे लोग उड़ेंगे जिनका आपसे सम्बंध हैं।वे सभी जो आपके क्रोधवेग की चपेट में आयेंगे। तो बनाईये स्वयं को वजनदार व्यक्तित्व का धनी। 


क्रोध के साथ ही वाणी का वेग भी प्रभावशील हो जाता है। आप क्या बोल रहे हैं आपके पता ही नहीं रहता। तब न तो आपका अधिकार अपनी वाणी पर रहता है न विवेक पर। आपकी बुद्धी सुप्त अवस्था में चली जाती है। चेहरा बद्सूरत हो जाता है। शरीर पर यह वेग अपना असर स्पष्ठ दिखाता है। स्वास्थ पर विपरीत प्रभाव होता है। रक्तचाप बढ़ जाता है। सामाजिक प्रतिष्ठा धूमिल हो जाती है। गृह कलह शुरू हो जाती है। लोग आपसे दूर हो जाते हैं आप एकाकी होने लगते हैं। इस वेग का एक ही समाधान है प्यार भरा गुस्सा। जो क्रोधवेग के अधीन न हो कर प्रेम पूर्ण अधिकार के अन्तर्गत हो। 


*अब मनन करते हैं।* क्या हैं हमारी आकांक्षाएं। क्या हैं हमारे ईगो। पद के, प्रभाव के, अभाव के, इन तीन के अलावा और कुछ है कारण गुस्से का? यही तो आप अपना अधिकार समझते हैं। तो सोचिए आपने कब-कब इस वेग को महसूस किया है। और कब इसमें उड़ गए और कब अपने को उड़ने से बचाया। आप देखेंगे कि निपट मूर्खता की है आपने जीवन के अनेक महत्वपूर्ण व निर्णायक क्षणों में। 


*चलो अभ्यास करते हैं।* आप क्रोध के वेग में थरथरा रहे हैं। बस उड़ने ही वाले हैं। यह अंधड़ आपको अपने पाश में ले रहा है और आप किसी पन्नी या पत्ते की तरह उड़ जाएंगे। तो जरा सोचो कहां गिरोगे। अपनी पलकों को तेज चलाओ। पैर के अंगूठे और अंगुलिओं को गतिमान रखो। स्थिर आधार को मानसिक रूप से जकड़ो रहो। किसी भी शक्तिमंत्र जो भी आपको उचित लगे उसे मौन उच्चारित करो। प्राप्ति को भविष्य पर छोड़ो। और “चलो जाने दो यार जो हुआ, हुआ अब फिर देखेंगे” की धारणा को पुशअप करो। हालांकि क्रोधवेग के उतर जाने पर भी आप यही करने वाले हैं लेकिन सब कुछ खत्म करके। अब यह तो हुई तत्काल की बात। लेकिन इस प्रवृति पर अंकुश कैसे। अमृतघट-1 में हमने वाणीवेग को नियंत्रित करने के लिये संकल्प लिया था और एक फिट का डोरा लिया था। अब उस संकल्प में सुबाह ही क्रोधवेग को भी जोड़ लें और डोरे को दो फिट का कर लें ।  एक सिरे से वाणीवेग का फाउल और दूसरे सिरे से क्रोधवेग का फाउल। हर फाउल पर एक गाँठ। रात को सोने से पहले इसका विश्लेषण करें कि आज वाणीवेग के कारण आपने कितने फाउल किए और क्रोधवेग के कारण कितने फाउल किए। धीरे धीरे इन गाँठों की संख्या कम होते होते शून्य कीजिए । हाँ क्रोधवेग घर में पति-पत्नि, भाई-बहन, माता-पिता-बच्चों सब पर भी लागू होगा। शुरुआत तो यहीं से होगी न।


आगामी कड़ी में हम फिर चर्चा करेंगे तीसरे वेग की
चौ. मदन मोहन समर