<no title>हमने 70 साल में इन्हें क्या दिया ? हाँ सिर्फ़ मनरेगा

 


 


हमने 70 साल में इन्हें क्या दिया ? हाँ सिर्फ़ मनरेगा


के के उपाध्याय 


सामने तरू-मालिका अट्टालिका, प्राकार। 
चढ़ रही थी धूप; गर्मियों के दिन दिवा का तमतमाता रूप; 
उठी झुलसाती हुई लू,रूई ज्‍यों जलती हुई भू, गर्द चिनगी छा गयीं, 
प्राय: हुई दुपहर :-वह तोड़ती पत्‍थर।
देखते देखा मुझे तो एक बार  उस भवन की ओर देखा, छिन्‍नतार; 
यह पंक्तियाँ सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की कविता वह तोड़ती पत्थर से है । कोई पाँच दशक पहले लिखी गई यह पंक्तियाँ आज भी प्रासंगिक है। आज़ादी के 70 साल बीत चुके है। प्रगति का यशोगान बढ़ चढ़कर हर सरकार ने सुनाया । आज प्रगति तार तार है । बेज़ार है । मजबूर है। मज़दूर है। हर सड़क पर । हर हाई वे पर क़तार लगी है । ग़रीबी की । बेबसी की । लाचारी की । भूखे है। प्यासे है। कोई नंगे पैर है । कोई पैरों में प्लास्टिक की बोतल बांधे है । वह भारत जो दिख रहा था । अचानक पर्दा हट गया। बेबसी सामने आ गई । आज असली भारत सड़कों पर है । हज़ारों किलो मीटर पैदल चल रहा है । कोई अपनी बूढ़ी माँ को काँधे पर टांगे है । कोई अपने बच्चे को ट्रॉली बैग पर अध लटका हुआ घसीट रही है । 70 साल की प्रगति सिसकियाँ ले रही है । ग़रीबी अट्टहास कर रही है । मज़ाक़ उड़ा रही है । मज़दूर आज भी बेबस है । हम सब देख रहे है । वे बेघर हो चुके है। अपने गाँव लौटने की बेताबी है । घर के आँगन को बुहारने की जल्दी है । महीनों से पैदल चल रहे है। कोई साइकिल से सड़क नाप  रहा है । चारों और हा हा कार है । हा ...भारत माँ ये तेरी कैसी दुर्दशा है । लॉकडाउन ने कलई खोल दी । उघाड़ कर रख दिया भारत मां का बदन ! ये कैसी आज़ादी है । यह कैसी विकास गाथा है ? यह कैसा यशोगान है ? कोरोना तो संक्रामक बीमारी है । सड़कों पर यह सैलाब क्या है ? यह कौन सी महामारी है ? सचमुच हम मजबूर देश है। मज़दूर देश है। भूख से बिलखते बच्चे । थोडी सी राहत पर टूट पड़ने वाले ये लोग भूखे क्यों है? हमने 70 साल में इन्हें क्या दिया ? हाँ सिर्फ़ मनरेगा । इनके विकास के नाम पर फ़ाइलें बनी है । आँकड़े बने है। सरकारों ने अपने गाल बजाए है। पर पूरा भारत सिसक रहा है । पिता लाचार दिख रहा है । माँ नौनिहाल को चिपकाए है । भोजन का इंतज़ार है । सरकारें रोटियाँ सेंक रही हैं । अपने अपने ढंग से । अपने अपने रंग से । मज़दूर मगर भूखा है ।असली भारत आज सड़कों पर है । कोरोना से बेख़बर । चिंता है तो घर पहुँचने की । आने वाले क। की । यह कल संवारना होगा । इस सरकार से उम्मीद भी है । विश्वास भी । इस सैलाब को थामिए । सँभालिए । भगवान के लिए इन बेबसों पर राजनीति मत करिए ।