अमृतघट
कवि मदन मोहन समर
इस अमृतघट में कुछ बूंदे हैं जीवन के लिए। प्रारम्भ करते हुए मैं मेरे स्वार्थ से मुक्त नहीं हूँ। मुझे भी तो कुछ मिलेगा ही इस घट से । इसे हम तीन भागों में बाँट रहे हैं पहला जानना दूसरा मनन और तीसरा अभ्यास। ज्ञान कभी भी परिपूर्ण नहीं हो सकता। इसलिये मैं अगर एक तार छेड़ रहा हूँ तो आपकी सैंकड़ों स्वर लहरियां मुझे और अधिक गहराई तक ले जाएंगी यह मेरा उद्देश्य है जानने का। अब मनन और अभ्यास मैं आपके जिम्मे छोड़ रहा हूँ। क्योंकि यह पूर्णताः निजी प्रयास है। इन सोपानों पर मैं व आप नितांत अकेले हैं। हम जो भी करेंगे वह हमारे लिए है कोई भी अन्य उसका भागीदार नही हो सकता। इसलिये अगर हो सके तो इन सोपानों पर एकाकी प्रयास कर देखियेगा क्या पाया हमने। यह आज प्रथम पृष्ठ है अमृतघट का इसलिये यह भूमिका आपको बताना आवश्यक थी। यह प्रयास प्रतिदिन अनवरत रखने का प्रयास करूंगा। कहाँ तक यह धारावाहिक यात्रा करता है देखते हैं।
अमृतघट 1
हमारी जीवन की हर समस्या के लिए हम स्वयं उत्तरदायी हैं। मनुष्य के जीवन में छः प्रकार के वेग होते हैं। यह इतनें प्रभावशाली होते हैं कि हमें पता ही नहीं चलता हम कब इसके विध्वंसक प्रवाह में बह जाते हैं। यही वेग हमें पतन की ओर ले जाते हैं।
पहला वेग “वाणीवेग”
न कोई विद्वान इससे अछूता रहा है व न कोई मूर्ख। कोई विरला ही व्यक्ति होगा जो इस वेग से बच सका होगा। वाणीवेग का प्रवाह अचानक इतना तीव्र हो जाता है कि हमें पता ही नहीं चलता। हम यह भी नहीं समझ पाते कि हम किससे क्या कह रहे हैं, इस दशा में बिना कुछ भी सुने बोलते चले जाते हैं। इसके परिणाम से हम परिचित नही होते । कुछ लोगों की आदत होती है बात-बात पर अपशब्द कह जाने की। उनकी वाणी का वेग उनके नियंत्रण में नहीं होता और वे अनेक बार ऐसे स्थान पर इस तरह से बोल जाते हैं कि सिर्फ शर्मिंदगी के अलावा उनके पास कुछ नहीं बचता। एक बहुत महत्वपूर्ण उदाहरण है। द्रोपदी ने अपने वाणीवेग को नियंत्रण में नहीं किया व दुर्योधन को कह दिया अंधे का पुत्र अंधा। जबकी यह बोलना उसके लिये कहीं से भी उचित नहीं था क्योकि धृष्टराष्ट्र द्रोपदी के ससुर थे। अगर वे उसके ससुर न भी होते तब भी कोई व्यक्ति किसी की ऐसी वाणी को सुन कर खिन्न होगा ही। परिणाम कितना भयावह हुआ हम सब जानते हैं।
हमारा वाणीवेग ही है जो हमें लगातार प्रलाप करने पर उकसाता रहता है। अक्सर सुनते हैं फलां व्यक्ति बहुत बोलता है। लेकिन वह फलां यह जानता ही नहीं कि वह वाणीवेग के प्रवाह में कैसे बहा जा रहा है। बिना मांगे सलाह देना। आत्मप्रशंसा में मुग्ध होकर प्रलाप करना। अवसाद की स्थिति में अपना दुख और परेशानियों को धारा-प्रवाह बोलते जाना। किसी के विरोध अथवा समर्थन में बिना गुण-दोष जाने लगातार संभाषण करना। यह सभी वाणीवेग की धाराएं हैं। हमारे शास्त्रों ने भी वाणीवेग पर नियंत्रण को बहुत जरूरी बताया है। कहा भी जाता है तोल-मोल के बोल। लेकिन हम कभी भी इसका पालन नहीं करते। जिन लोगों का अपने वाणीवेग पर नियंत्रण होता है लोग अक्सर मानते हैं कि उसकी बात में वजन दारी है। इसके उलट लोग वाचाल और फोकट बक-बक करने वाले कहलाते हैं।
अब मनन करते हैं । क्या हमारा वाणीवेग पर नियंत्रण है? क्या हम भी तो अनजाने में ही सही इस वेग के प्रवाह में तो नहीं बह रहे हैं? क्या हमें इस वेग पर बाँध बनाने की जरूरत है? हो सकता है आपका पूर्ण नियंत्रण हो इस पर। लेकिन नहीं है तो आपके सचेत तो हो ही जाना चाहिये। बस मनन कीजिये और अभ्यास कीजिये इसे बांधने का।
अभ्यास कैसे करें
एक करीब एक फिट का डोरा अपने पास रखें। अगर कलेवा में उपयोग किया जाने वाला लाल डोरा रख सकें तो ठीक है अन्यथा कोई भी सादा धागा। सुबाह उठते ही संकल्प लें कि आज मैं मेरे वाणीवेग पर नियंत्रण रखूंगा। फिर दिन भर इसका प्रयास करें कि बिना माँगे किसी को सलाह नहीं दूंगा, अपने अवसाद किसी को समक्ष नहीं बोलूंगा, आत्मप्रशंसा में कुछ नहीं कहूंगा. किसी भी समूह में अपनी बात प्रभावी व संयम से रखूंगा, अनावश्यक शब्दों का उपयोग नहीं करूंगा, कोई भी अपशब्द किसी से नहीं कहूंगा, मेरी आदत में शुमार लोगों को कष्ट पहुंचाने वाले शब्द का प्रयोग नहीं करूगां, आदि जो भी लगता है यह वाणीवेग है रोकूंगा। लोकिन यह इतना सम्भव नहीं है कि आप सोचें और इस भीषण वेग को किसी दैवीय य मायावी शक्ति की तरह बाँध लें। किसी छोटी सी बहती हुई जलधारा को बाँधने में भी समय लगता है। तो आपने जो एक फिट का डोरा अपनी जेब में रखा है यही इसका लौह है। यहां पर आप खिलाड़ी हैं व आपकी अन्तरआत्मा रैफरी। अब आपको करना यह है कि आप जब भी इस वेग में बहे वह आपका फाउल होगा। अर्थात आपने जो बोला वह आपकी अंतरआम्मा रूपी रैफरी के अनुसार उचित नहीं था। आप इसे सार्वजनिक रूप में क्या मानते हैं यह प्रश्न नहीं है। किंतु आपकी अंतरआत्मा क्या इसे फाउल मान रही ह? हर फाउल पर एक गाँठ उस डोरे में बाँध लें। दिन भर यह आपको अभ्यास करना है व सुनिश्ति करें “हर फाउल पर एक गाँठ डोरे में बाँधना है” अब जब आप रात्री में सोने हेतु जाएं तो डोरा निकाले व देखें आज कितनी गाँठें बंधी है। हो सकता है एक भी गाँठ न हो तो यह मानिए आप बहुत ही संयमी व आत्म नियंत्रित व्यक्ति हैं। यदि कुछ गाँठे बंधी हैं तो चिंता न कीजिये। धीरे धीरे आप देखेंगे एक दिन ऐसा आएगा कि आपके डोरे पर एक भी गाँठ नहीं है। लेकिन ध्यान रहे दो चार दिन गाँठ न होने पर यह न मान लें कि आपने अपने वाणीवेग पर पूरी तरह नियंत्रण पा लिया है। यह अभ्यास सतत जारी रखना होगा एक आदत के रूप में। तब एक वक्त ऐसा आ जाएगा कि आप अपने वाणीवेग को पूरी तरह अपने नियंत्रण में कर लेंगे। इसकी प्रतिक्रिया आपको मिलना शुरू हो जायेगी। लोग आपकी बात में वजन देखने लगेगें व आपका सम्मान बढ़ जाएगा।
कल हम अमृतघट-2 में दूसरे वेग के विषय में चर्चा करेंगे।
चौ.मदन मोहन समर